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 *है कहाँ जिंदा ईमान अब ?* गर्दिशों में है पहचान अब है कहाँ जिंदा ईमान अब ? कुरीतियाँ खड़ी मुँह उठाये सन्नाटे के मंजर क्यों छाये कहाँ से हौसले अब लाये है धुआँ धुआँ आसमान अब है कहाँ जिंदा ईमान अब ? व्यस्त हैं आज यहाँ सभी बच्चे बचे नहीं भावना अब सच्चे दोस्ती, रिश्ते नाते सभी कच्चे अपमानित होता सम्मान अब है कहाँ जिंदा ईमान अब ? घर में बेटियाँ लाचार क्यों बेटी पर हो अत्याचार क्यों बेटी से गलत वयवहार क्यों शैतान बनता क्यों इंसान अब है कहाँ जिंदा ईमान अब ? अब वही जमाना रहा नहीं सच कहा किसी ने सुना नहीं सिलसिला आगे बढ़ा नहीं खोते होठों से मुस्कान अब है कहाँ जिंदा ईमान अब ?  *अनिता मंदिलवार "सपना"*
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दिनाँक - 3/02/2020 दिन - सोमवार विषय - *पशुधन* विधा - दोहा छंद गौ की सेवा से हुआ, जीवन का उद्धार। दूध दही नवनीत है, भोजन के आधार।। गौ की रक्षा जो करे, होगा बेड़ा पार। वैतरणी ही वो तरेे, जो जीवन का सार।। गौ धन है सबसे बड़ा, धन से मत तू तोल। भवसागर से तार दे, दिल की आँखे खोल।। गोबर डालो खेत में ,है यह अच्छी खाद। स्वस्थ फसल तैयार हो, पक जाने के बाद।। गैया  संगत  खेलते,  होते सदा विभोर।  माखन नित ही खा रहे, देखो माखन चोर।। ✒ राधा तिवारी "राधेगोपाल" खटीमा ऊधम सिंह नगर उत्तराखंड
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देश की हुंकार* जय जननी भारत, जन मन अभिमत, देश हित वीरवर, बोलियाँ सुनाइए । राष्ट्र गान जन मन, गाते मिल सब जन, ऊँचे आसमान पर, ध्वज फहराइए । जय जवान बोल कर, मन सारा खोल कर, वंचितों का मान रख, कर्तव्य निभाइए । देश की हुंकार जब, सुनते हैं तब सब, जात पात भूल कर, देश राग गाइए । *अनिता मंदिलवार सपना*
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माहिया छंद (टप्पा ) 222222-12 22222-10 222222-12 1/सावन देखो आया  प्रियतम मेरे सुन मेरा मन हर्षाया l 2/रिमझिम रिमझिम बरसे जल इन अँखियों से बदरी कोई तरसे l 3/हर आहट पे लागे जैसे तुम आये  मनवा सुन के जागे l 4/मन मेरा यूँ तड़पे तेरा कहना मुझसे कल आऊंगा तड़के l 5/सोलह श्रृंगार करूं बैठ थकूं सजना आने की आस भरूं l 6/अब संग मुझे  जीना चाहूँ साथ सदा गम हँस के पीना l 7/चाहूँ दिल में रहना धड़कन बन तेरी साँसो में है बहना l 8/अब नैनों में बसना  देखूँ जब तुझको  मन हो मेरा रसना l 9/साजन मेरे सजना अब तो है मुझको जीवन भर सजना l 10/अब काहे को डरना  बिन तेरे जीना जीते जी है मरना l सरोज दुबे रायपुर छत्तीसगढ़ 🙏🙏🙏🙏
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अपने प्रिय जनों को समर्पित--- *अपने* सब मिलकर रहें, पूर्ण करें सब *काम*। *काम* विकारों से परे, *धाम* वही सुख *धाम* *धाम* वही सुख *धाम*, पुष्प सा होता *विकसित* *विकसित* हो परिवार, नहीं वे होते *व्यवसित* *व्यवसित* कवि के भाव, लगे हों मानो *तपने* *तपने* लगते गैर, शांति पाते हैं *अपने* संजय कौशिक 'विज्ञात' काम - कार्य, काम विकार धाम - घर , तीर्थ विकसित - खिला हुआ , विकास व्यवसित संस्कृत शब्द विशेषण  से अर्थ क्रमानुसार  - धैर्यवान , तत्पर बनते हैं संज्ञा से क्रमानुसार - छल, निर्धारण बनते हैं तपने - तपस्या, तप्त/ गर्म  होना
अपने प्रिय जनों को समर्पित--- *अपने* सब मिलकर रहें, पूर्ण करें सब *काम*।  *काम* विकारों से परे, *धाम* वही सुख *धाम* *धाम* वही सुख *धाम*, पुष्प सा होता *विकसित*  *विकसित* हो परिवार, नहीं वे होते *व्यवसित*  *व्यवसित* कवि के भाव, लगे हों मानो *तपने*  *तपने* लगते गैर, शांति पाते हैं *अपने* संजय कौशिक 'विज्ञात'  काम - कार्य, काम विकार धाम - घर , तीर्थ  विकसित - खिला हुआ , विकास व्यवसित संस्कृत शब्द विशेषण  से अर्थ क्रमानुसार  - धैर्यवान , तत्पर बनते हैं संज्ञा से क्रमानुसार - छल, निर्धारण बनते हैं  तपने - तपस्या, तप्त/ गर्म  होना
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दोहा में त्रिकल का महत्व:- त्रिकल पंचकल पूर्व लें, उत्तम बने प्रवाह। पाठक पढ़ कर कह उठे, अच्छा है ये वाह॥ त्रिकल सहित लो दो जगण, रखो द्विकल का भार। चरण जगण अवरुद्धता, दोष मुक्ति का सार॥ तीन त्रिकल लेना नहीं, कभी एक ही साथ। दोहा लय श्रोता सुनें, खूब बजाएं हाथ॥ अगर त्रिकल ले रहे, किसी चरण में आप। उसे अकेला मत कहें, करें युग्ल आलाप॥ त्रिकल एक चौकल लिखा, लय बाधित का ज्ञान। खड़ा रहे अवरोध तो, कैसा शिल्प विधान संजय कौशिक 'विज्ञात'
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#दिनांक 👉 26/11/2019 #रस 👉 #शांत_रस #विधा 👉 #दोहा-छन्द """""""""""""""""""""""""""""""""""""""" जिसके अंतर्मन बसा, मानवता का रूप। जग में नित करता भला, होता ईश स्वरूप।।०१।। बड़े भाग तन मनुज का, मिले सुखों का भोग। सत्संगति मिलती तभी, हो अच्छा संयोग।।०२।। सब घट वासी राम को, जाने संत सुजान। समदर्शी बनता वही, जिसे है आत्मज्ञान।।०३।। अपने घट की जान लो, मत भटको चहुँ ओर। ईश्वर हर घट में बसे, घट में ही है चोर।।०४।। तन की चाल सुधार लो, मन का मेटो खोट। जो वाणी वस में रखे, उसे प्रभो की ओट।।०५।। बाहर भटके से कभी, मिलें नहीं भगवान। अपनी करनी देख ले, अंतर्मन को जान।।०६।। घट की बातें सब करें, देख न पावे कोय। कैसे अन्तर्जगत में, भला बुरा सब होय।।०७।। धर्मवान हो बाप जी, गुणवंती हो नार। कर्मशील संतान हो, सुखी रहे परिवार।।०८।। व्यर्थ कभी मत खोइए, जीवन है अनमोल। अंतर्मन में द...
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दिनांक:-14/11/2019 दिवस:- बुधवार(बाल दिवस) विधा:- चौपाई छंद *!!बचपन!!* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 बचपन अब इठलाता घूमे। चलती दुनियाँ में वो झूमे।। मोबाइल से हेत लगा है।   गूगल उसका आज सगा है। नहीं सुने अब प्यारी लोरी। करे न माखन की अब चोरी।। नहीं खेलता मीत संग में। नेट बसा अब अंग अंग में।। बचपन सुने न रात कहानी। अब तो मोबाइल है नानी।। बड़ा हुआ अब पीते-खाते। संस्कार सब भूलते जाते।। ये तो हुई महल की बातें। सुनो झोंपडी की अब रातें।। दीन हीन घर पैदा होकर। खावे बचपन दर दर ठोकर।। हृदय प्रेम का सागर भारी। भरी मोती से चक्षु झारी।। निश्छलता बसती है मन में। फिर भी काँटे हैं जीवन में।। हे! रब कैसी ये मजबूरी। बचपन सुख से कितनी दूरी।। उथल-पुथल मय जीवन सारा। कहाँ भटकता बचपन प्यारा।। भारत भाग्य कहाँ सोता है। छिपकर के बचपन रोता है। भूख पेट की बड़ी सयानी। कर दे बचपन पानी-पानी।। सुनो योजना संसद पन्ने। बचपन हित होवो चौकन्ने।। आँचल कंधा तुम भी जानो। उस बचपन के दिल की मानो।। कहे 'सुमा' दिल से ये बातें। जाग न पाए बचपन रातें। मानव हो मानवता धरना। बचपन हित में क...
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विशिष्ट सृजन, पूरा पढ़ें प्रतिक्रिया अपेक्षित है🙏 🌕🤴🌕🤴🌕🤴🌕🤴🌕🤴 ~~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा .                    (रोला छंद) .         🦅  *चंद्र,  इन्द्र ....हम*  🦅 .                 🌕...🤴....🌍 .                   ✨✨✨ चंद्र  इंद्र  नभ  देव, सदा शुभ  पूज्य  हमारे। हम  पर  रहो प्रसन्न, रखो आशीष  तुम्हारे। लेकिन मन के भाव, लेखनी सच्चे लिखती। देव दनुज नर सत्य, कमी बेशी जो दिखती। .                   ✨✨✨ क्षमा सहित  द्वय देव, पुरानी  बात  सुनाऊँ। लिखता  रोला  छंद, भाव कुछ  नये बताऊँ। शर्मा  बाबू  लाल, सुनी  वह   तुम्हे  सुनाता। बीत गया युग काल, याद फिर से आजाता। .                   ✨✨✨ ...
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महात्मा गाँधी बापू *!!रोला छंद!!* ******************************** खुशी रहो सब आज, जयंती गाँधी जी की। मने जयंती संग, सदा ही शास्त्री जी की।। जन्मे वीर सपूत, यही था दिन वो पावन। जयतु भारती मात, दिए दो पूत लुभावन।। रखिये उनको याद, नमन करना मत भूलो। ले आजादी फूल, सदा मन में अब झूलो।। ऐसे वीर महान, हुए इस भारत भू पर। जीवन ये कुर्बान, किया मन में खुश हो कर।। चले सत्य के पंथ, अहिँसा के व्रत धारी। भगा फिरंगी लाज, बचाई तभी हमारी।। गाँधी जैसे पूत, बने सबके रखवाले। देश प्रेम हित छोड़, चले थे सब घरवाले।। लिया सत्य का साथ, करे आन्दोलन भारी। सुख साधन सब छोड़, हटाया सूट सफारी।। भारत माँ के काज, दिनों दिन कष्ट सहे। इसके खातिर देख, पिता जी जेल रहे।। थर थर काँपे राज, डरे अंग्रेजी सारे। देख सत्य का जोर, सभी वो मन से हारे।। जान गाय था विश्व, सत्य में ताकत भारी। बापू से ही आज, बनी पहचान हमारी।। भारत के सरताज, बने गाँधी जी प्यारे। हम सब ही संतान, पिता वो बने हमारे।। 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 *✍© प्रजापति कैलाश 'सुमा'* ढिगारिया कपूर, मेहन्दीपुर बालाजी, दौसा, राजस्थ...
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*!!नवरात्रा!!* ~दोहा छंद~ 🌹🔥🔥🔥👏🏻🔥🔥🔥🌹 हे! महिषासुर मर्दिनी, शूलधारिणी मात। महातपा सुरसुंदरी, नाम बड़े विख्यात।। मात भवानी अम्बिके, दुर्गा रूप अनेक। वन्दन माँ तेरा करूँ, चरणों माथा टेक।। शेरावाली आज तो, आना मेरे द्वार। शीश हाथ रख दीजिए, मेरी यही पुकार।। आदि भवानी आप हो, इस जग की करतार। हम सेवक भोले सभी, करिये नौका पार।। आओ माँ विनती करें, सजा आज दरबार। दर्शन दो माँ चंडिका, सबके कष्ट निवार।। नौ रातों के रूप को, करता कोटि प्रणाम। जीवन परहित में लगे, रहे यही बस काम।। हर बेटी दुर्गा समा, जग में बने महान। रहे सुरक्षित हर जगह, इतना दो वरदान।। मैं खोटा किंकर सदा, आप सुधारो काज। कहे 'सुमा' जग में रखो, माता मेरी लाज।। 🌹🔥🔥🔥👏🏻🔥🔥🔥🌹 *✍प्रजापति कैलाश 'सुमा'* ढिगारिया कपूर, मेहन्दीपुर बालाजी, दौसा, राजस्थान।

दुर्गा वंदना

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सादर नमन 👏🏻🌹*   नवरात्रा *!!* रोला छंद!! दुर्गा वंदना *************************** सुनिये दुर्गा मात,       कृपा मुझ पर भी करिये। बड़े प्यार से हाथ,       सदा मेरे सिर धरिये।। कहे 'सुमा' कर जोड़,       चरण में शीश झुकाऊँ। आदि भवानी मात,        प्रथम मैं आप मनाऊँ।। 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻 माँ तेरे नौ रूप,        बड़े सुंदर मन भावें। आना अम्बे आज,        खुशी से भजन सुनावें।। कहे 'सुमा' नादान,        करो मत अब तो देरी। माता झोली आज,        भरो खुशियों से मेरी।। *************************** रचनाकार प्रजापति कैलाश 'सुमा' ढिगारिया कपूर मेंहंदीपुर बालाजी, दौसा, राजस्थान।
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*आदत* . ..... हम फूल है "सपना"     अपनी आदत है ऐसी । गम देने वाले को भी    तोहफा खुशी का देते है ।। ...... *अनिता मंदिलवार "सपना"*
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विधान- *मत्तगयंद सवैया* भगण ×7+2गुरु, 12-11 वर्ण पर यति चार चरण समतुकान्त। *मतगयंद सवैया* कंकर-कंकर है शिव शंकर, शंकर देव बनें वह सारे। नर्मद से निकले जब पत्थर, पूजन के अधिकार हमारे॥ भाव बिना भगवान कहाँ यह, सत्य कहूँ सब तथ्य विचारे। साफ रखो हिय प्रेम बढ़े फिर, ये सुख सागर नाथ सहारे॥  *संजय कौशिक "विज्ञात"*
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कुण्डलिया आये शंकर साधु बन, नंदगाँव इस बार। रूप भयंकर धार के, कहते अलख पुकार कहते अलख पुकार, करूँ ललना के दर्शन। मात किया इनकार, चले कर चुटकी स्पर्शन कह कौशिक कविराय, तभी कान्हा चिल्लाये। दुख पा तज हठ मात, किये दर्शन फिर आये संजय कौशिक 'विज्ञात'
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*मदिरा सवैया* मदिरा सवैया में 7 भगण (ऽ।।) + गुरु से यह छन्द बनता है, 10, 12 वर्णों पर यति होती है। 4 चरण समपाद रहेंगे रूप शशांक कलंक दिखा, पर शीतल तो वह नित्य दिखा। और प्रभा बिखरी जग में, इस कारण ही यह पक्ष लिखा॥ खूब कला बढ़ती रहती, तब जीत गई फिर चंद्र शिखा। आँचल में सिमटी उसके, तब विस्मित देख रही परिखा॥ संजय कौशिक 'विज्ञात'
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*मदिरा सवैया* मदिरा सवैया में 7 भगण (ऽ।।) + गुरु से यह छन्द बनता है, 10, 12 वर्णों पर यति होती है। 4 चरण समपाद रहेंगे रूप शशांक कलंक दिखा, पर शीतल तो वह नित्य दिखा। और प्रभा बिखरी जग में, इस कारण ही यह पक्ष लिखा॥ खूब कला बढ़ती रहती, तब जीत गई फिर चंद्र शिखा। आँचल में सिमटी उसके, तब विस्मित देख रही परिखा॥ संजय कौशिक 'विज्ञात'

रिश्ते

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रिश्ते रिश्ते होते हैं अनमोल, समझो सभी इसका मोल ! कुछ बोलने से पहले, शब्द को तुला लेकर तोल !! अनिता मंदिलवार सपना 

गीत

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**हे चंदा मामा ! फिर आयेंगे* *चंद्रयान पर बैठ हम आयेंगे** सफेद उज्जवल चाँदनी लगे आसमान की मोती नन्हा बालक देखता तुझे उसे पता है कल फिर आयेंगे *हे चंदा मामा ! फिर आयेंगे* *चंद्रयान पर बैठ हम आयेंगे** सफेद उज्जवल चाँदनी लगे आसमान की मोती नन्हा बालक देखता तुझे उसे पता है कल फिर आयेंगे *हे चंदा मामा ! फिर आयेंगे* *चंद्रयान पर बैठ हम आयेंगे** प्यारे प्यारे चंदा मामा तेरी परछाई दिखे पानी में दुआ मेरी है चमकता रहे तू काली बदली भी घिर छायेंगे *हे चंदा मामा ! फिर आयेंगे* *चंद्रयान पर बैठ हम आयेंगे** रात का घनघोर साया आकाश में चाँद जगमगाया प्यारी छवि तेरी न्यारी छाया गोल चकोर चंदा गीत गायेंगे *हे चंदा मामा ! फिर आयेंगे* *चंद्रयान पर बैठ हम आयेंगे** अनुसंधान हुआ है बड़ा देखो चन्द्रमा पर खड़ा विक्रम का है चमत्कार उन्नति के शिखर पर चढ़ पायेंगे *हे चंदा मामा ! फिर आयेंगे* *चंद्रयान पर बैठ हम आयेंगे** ये रच गया इतिहास अब करो न परिहास नया है ये धवल प्रयास चाँद पर भी परचम लहरायेंगे *हे चंदा मामा ! फिर आयेंगे* *चंद्रयान पर बैठ हम आयेंगे** दुनिया में हम ...
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शजर-ए-तन्हा से एक गज़ल तूफान से डर क्या है निकलिए तो घरों से कुछ तुन्द हवाओं के तकाजे हैं परों से किस बात का खदशा इन्हें किस बात का डर है क्यों लोग निकलते ही नहीं आज घरों से हर आईने में टूटे हुए चेहरे मिलेंगे उम्मीद नहीं कुछ भी हमें शीशागरो से वैसे तो पहाड़ों की बुलंदी पे है बस्ती परवाज तो कर काम तो ले अपने परों से कितने ही कदम आयेंगे और साथ चलेंगे इक  बार बस इक बार निकलिए तो घरों से हिम्मत नयी मिल जाती है उस वक़्त सभी को शैली जो गुजरने ही लगे पानी सरों से     आशा शैली
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★★★ *हिन्दी* ★★★ न भाषा कह अपमान करो, ये शब्दों की जननी है हिन्दी है माथे की बिन्दी, ये मन को पावन करनी है !! अ से ये अज्ञान मिटाकर, ज्ञ से ज्ञानी करती है हिन्दी है ये वीर प्रतापी, नही किसी से डरती है !! आँखे इसकी अलंकार है, गण है इसकी नासिका दोहे इसकी चार भुजाएँ, इस पर जोर चला किसका !! गाल गुलाबी बना सोरठा, चौपाई से कान बने जिव्हा से है सब रस टपके, गीतों से है शान बने !! देख गीतिका गले में बैठी, कुण्डलियाँ मुख बोली है अक्षर का सबको दूध पिलाया, तब जाकर हिन्दी डोली है !! सरसी जिसका पेट बना है, मनहरण हृदय धड़कता है हिन्दी के इस सागर को कोई पार नही कर सकता है !! रोम रोम है लावणीयाँ और पैरों में हर गीत रहे ये हिन्दी है सबसे कहती हम सब इसके मीत रहे !! देवनागरी नमन है करती शीश *नरेन* झुकाता है हिन्दी के आशीष को पाने हर कोई दौड़ा आता है !! :::::::----- *हिन्दी दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं* !! ***** *जय हिन्दी* ****** :::::::---- नरेन्द्र डग्गा " *नरेन* " बगड़ी नगर , पाली , ( राज.) 84268-93668 🙏🙏🙏🌹🌹🙏🙏🙏
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~~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा  पत्र~विधा     .             🐚 *सौतन* 🐚 मेरे प्रिय सखे रचनाधर्मी, .                अशेष स्नेहाशीष🙌🙌🙌 आज मै अपनी पीर कहानी पत्र द्वारा तुम्हें बता रही हूँ। क्योंकि राज सभा में द्रौपदी से भी बदतर स्थिति है मेरी वर्तमान में। अब तो बस श्रीकृष्ण की तरह तुम्हारा ही भरोसा शेष है। इसी आशा और विश्वास से पत्र लिख रही हूँ।ध्यान देना सखे। मैं हिन्दी (भाषा) हूँ। माँ संस्कृत(भाषा) का मुझे अपार स्नेह व दुलार मिला है। इतना कि दुलार करते करते माँ अब जरावस्था में पहुँच गई । मै स्वतंत्र भारत की राष्ट्र भाषा बन गई हूँ। पर यह इतर बिन्दु है कि अभी तक शासन की ही दोगली नीति के कारण मै वह सम्मान प्राप्त नहीं कर पा रही जिसकी मैं स्वयं अधिकारिणी हूँ। हालांकि देश की जनता मुझे राजरानी राजमाता सम मानती है पर सरकार के प्रतिनिधि अभी तक सरकारी कार्यालय, कोर्ट कचहरी संसद,विधान सभाओं में अनावश्क रूप से मेरी उपेक्षा करते रहते है। यहाँ तक कि कुटिल स्वार्थी नेता भाषायी विवाद तथा , झगड़े भड़काने...

क्या है हिन्दी का भविष्य?

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*क्या है हिन्दी का भविष्य* ? =================== आलेख- *अनिता मंदिलवार सपना*       हिंदी आज एक ऐसी भाषा है जो दुनिया में इतने बड़े स्तर पर बोली व समझी जाती है । मीडिया ने हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दुनियाभर में आज भारतीय फिल्में व टेलीविजन कार्यक्रम देखे जाते हैं। इससे भी दुनिया में हिंदी का प्रचार-प्रसार हुआ है। सोशल मीडिया, इंटरनेट व मोबाइल के कारण आज युवा पीढ़ी इस भाषा का सबसे अधिक प्रयोग कर रही है । हिंदी आज देशभर में आम बोलचाल की भाषा है। आज अधिकतर लोग हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं। आज यह भाषा कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक देश को जोड़ने वाली भाषा है। हिंदी के विस्तार में मीडिया की अहम भूमिका है। हिंदी भाषा दुनियाभर में समझी बोली जाती है। मीडिया ने हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दुनियाभर में भारतीय फिल्में टेलीविजन कार्यक्रम देखे जाते हैं। इससे भी दुनिया में हिंदी का प्रचार-प्रसार हुआ है। सोशल मीडिया, इंटरनेट मोबाइल के कारण युवा पीढ़ी इस भाषा का सबसे अधिक प्रयोग कर रही है। यह इस भाषा की ताकत को बताता है। भाषा लोगों को जोड़ने का क...

मुकतक

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मुक्तक : मेरा ये शून्य सा परिचय मैं इसका मान रखता हूँ। नहीं कुछ कम अधिक इससे ये औसत शान रखता हूँ। समझ क्यों शून्य की कीमत पृथक मुझसे नहीं दिखती। अगर तू साथ दे मेरा अलग पहचान रखता हूँ। संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत

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नवगीत आ बैठे उस पगडण्डी पर जिससे जीवन शुरू हुआ था स्मृति अंतः पटल खड़ी थी जब आवरणों का शोर हुआ था। मन व्याकुलता के घेरे में, हृदय त्रास का जोर हुआ था। गिरा चुका था पंख सभी वो शोषित नृप सा मोर हुआ था लांघ न पाया जो मर्यादा बनता ये मन मेरू हुआ था आ बैठे उस पगडण्डी पर जिससे जीवन शुरू हुआ था वह सूर्य सप्त अश्व सुसज्जित बढ़े प्रतिज्ञा बद्ध निरन्तर ऊर्जा लेकर जब हम चलते शेष रहा मध्य बड़ा अंतर सहनशील सहिष्णु तम पाचक शांत स्वभाव क्रोध का सन्तर नयन क्रोध रक्तिम आभा से दुल्हन के तन गेरू हुआ था आ बैठे उस पगडण्डी पर जिससे जीवन शुरू हुआ था नीति ध्वस्त आडम्बर कलुषित कुंदन शोभा मंद पड़ी थी। लाल मिला फिर रेत भाव में द्वार जौहरी पंक्ति खड़ी थी। अंतः विचलित हो ही जाता उससे भी ये नीच घड़ी थी। शुद्ध अशुद्ध खरा या खोटा सच को देख पखेरू हुआ था आ बैठे उस पगडण्डी पर जिससे जीवन शुरू हुआ था आवश्यकता मातपिता से एक समय पूरी होती थी बाल पराश्रित जीवन सबका संचय से दूरी होती थी पर गुल्लक कच्ची मिट्टी की फोड़ें मजबूरी होती थी पाप स्वप्न ये देख वृद्ध के कभी मोती बखेरू हुआ था ...
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बचपन याद दिलाता एक गीत बिम्ब पुत्र प्रतिबिम्ब पौत्र हैं, जहाँ बुढापा रीत गया। उत्तम और श्रेष्ठ था बचपन, अपना था जो बीत गया॥ खो-खो कँचें रस्सी कूदो, और पुराना खेल गया। गिल्ली डंडा, चोर सिपाही, गिट्टे का वो मेल गया। कहाँ बैल हैं घुँघरू उनके, रहटों का संगीत गया। उत्तम और श्रेष्ठ था बचपन, अपना था जो बीत गया॥ नीचे घर ऊंची मर्यादा, गाँव गाँव में मिलती थी। सिर पे पल्लू हया आँख में, सुंदरता तब खिलती थी। देख चलन आधुनिक काल के, मन क्यों हो भयभीत गया। उत्तम और श्रेष्ठ था बचपन, अपना था जो बीत गया॥ बागों के वो ताज़ा फल जो, चोरी चुपके खाते थे। माली ले उल्हाना घर तक, पीछे पीछे आते थे। झूल झूलते थे सावन में, आधा रह वो गीत गया। उत्तम और श्रेष्ठ था बचपन, अपना था जो बीत गया॥ केवल कागे स्वर आलापें, कोयल का स्वर भूल गए। मित्र निभाते जहाँ मित्रता, अब तो वो घर भूल गए॥ धरा धारती हरित वसन जब, सरसों बूटी चीत गया। उत्तम और श्रेष्ठ था बचपन, अपना था जो बीत गया॥ संजय कौशिक 'विज्ञात'

शिक्षक

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शिक्षक ==////==== ज्ञान का भान कराते हैं वो सबका मान बढ़ाते हैं तमस से उजास की ओर जो ले जाते, शिक्षक कहलाते हैं जीवन पथ पर सही राह दिखाते हैं मुश्किल में हौसला बढ़ाते हैं जिनकी महिमा अनन्त हैं वही मार्गदर्शक शिक्षक कहलाते हैं कर्म को ही पूजा मान लेते हैं ईश्वर से स्थान ऊँचा पाते हैं बंजर धरती पर भी जो फूल खिलाते हैं वही शिक्षक जग में सम्मान पाते हैं हर परिस्थिति में खुश रहकर सिखाते हैं मानवता का पाठ हमें पढ़ाते हैं माता देती नवजीवन पिता करते रक्षा चुनौतियों से लड़ना शिक्षक सिखाते हैं विद्या देकर ज्ञानवान बनाते हैं पढ़ाकर लिखाकर हमारी ज्ञान बढ़ाते हैं शिक्षक बागवान है हम फूल चमन के शिक्षकों को शत शत प्रणाम करते हैं अनिता मंदिलवार "सपना" (व्याख्याता ) अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़

कुण्डलिया

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🙏 *कुण्डलिया की कुण्डलियाँ।*🙏 ******************************* *कुंडलिया लिख लें सभी, रख कुछ बातें ध्यान।* *दोहा रोला जोड़ दें, इसका यही विधान।* *इसका यही विधान,आदि ही अंतिम आये।* *उत्तम रखें तुकांत, हृदय को अति हरषाये।* *कहे 'अमित' कविराज, प्रथम दृष्टा यह हुलिया।* *शब्द चयन है सार, शिल्प अनुपम कुंडलिया।* *रोला दोहा मिल बनें, कुण्डलिया आनंद।* *रखिये मात्राभार सम, ग्यारह तेरह बंद।* *ग्यारह तेरह बंद, अंत में गुरु ही आये।* *अति मनभावन शिल्प, शब्द संयोजन भाये।* *कहे 'अमित' कविराज, छंद यह मनहर भोला।* *कुण्डलियाँ का सार, एक दोहा अरु रोला।* ******************************* ✍ *कन्हैया साहू 'अमित'*✍ © भाटापारा छत्तीसगढ़ ®
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*विधवा का शव*              18 मार्च को कल्पना सुबह प्रातः कालीन भ्रमण के लिए जा रही थी कि अचानक इंदिरा सोसाइटी के बाहर एक श्वेत वस्त्र धारी महिला को औंधे मुँह पड़े हुए देखा और उस महिला के निकट जाकर कल्पना ने उसे हिलाया-डुलाया तो वह महिला निश्चेष्ट मृत समान प्रतीत हुई। तब कल्पना ने कुछ घबराहट भरी आवाज में विधवा का शव... विधवा का शव... इंगित करते हुए वहाँ से गुजरने वाले लोगों का ध्यान इस महिला की तरफ खींचा। धीरे-धीरे भीड़ एकत्रित हो गई, जिनमें से कुछ व्यक्ति उनके परिचित भी निकले जिन्होने बताया कि ये तो सुषमा जी हैं जिनके पति रामपाल 30 वर्ष पहले कार दुर्घटना में चल बसे थे और इकलौते पुत्र मयंक गत 35 वर्षों से विदेश में रहते हैं, अरबों की संपत्ति की मालकिन होते हुए भी सुषमा यहाँ अकेली ही रहती थी। इन्ही चर्चाओं के मध्य एकत्रित भीड़ में से किसी ने एम्बुलेंस को फोन कर दिया था तो किसी ने पुलिस को, दोनों ही 2 मिनट के अंतराल पर इंदिरा सोसाइटी के बाहर पहुँच गए और सुषमा जी के पार्थिव शरीर को ले गए।              अब कल्पना भी प्...

मुक्तक

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*मुक्तक                                           अनिता मंदिलवार सपना  किनारे सागर के कभी डूबा नहीं करते । गुजर जाता है वक्त, कदम थमा नहीं करते ।। रहकर खुश, बाँटो खुशियाँ, हँसते रहो हरदम । किसी की परेशानियों पर, हँसा नहीं करते ।। क्यों करते चिड़ियों सा, तुम कैद पिंजरे में । ख़्वाब दिल में ही रहें, क्यों फँसते खतरे में ।। पाबंदी न लगाओ, मुहब्बत में अब सपना । अपना जान क्यों देते, अक्सर वो सदमें में ।। अनिता मंदिलवार सपना अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़
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संजय कौशिक 'विज्ञात' जी का बहुत पसंद किया जाने वाला गीत व्यंजना कितनी समेटूं पृष्ठों पर मनमीत मेरे देख अक्षर मौन हैं अब शांत हैं सब भाव मेरे मंद है बेशक कलम पर जानती है घाव मेरे इस हवा से जब छिपाये रक्त रंजित स्राव मेरे सागरों की उर्मियों में भी बसे अब गीत मेरे व्यंजना कितनी समेटूं पृष्ठों पर मनमीत मेरे हो सके तो छोड़ दे तू इस कलम से खेलना फिर मुक्त अभिव्यक्ति लिखेगी तो सहज हो झेलना फिर बन्द करना ये पड़ेगा तू करे अवहेलना फिर दाव पर मैं स्वप्न मेरे हारते तब जीत मेरे व्यंजना कितनी समेटूं पृष्ठों पर मनमीत मेरे बादलों ने पीर गाई घाटियाँ गुंजित हुई तब लेखनी की वेदना से वेदना कंपित हुई तब बिम्ब बनते कथ्य के बिन बात वो लंबित हुई तब आज तक अटकी हुई जो भाग्य की वो रीत मेरे व्यंजना कितनी समेटूं पृष्ठों पर मनमीत मेरे संजय कौशिक 'विज्ञात'

पीयूष वर्ष

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छंद- पीयूष वर्ष (आधारित गीत) शिल्प विधान 10,9 पर यति प्रति 2 चरण समतुकांत 3, 10, 17 वीं मात्रा लघु अनिवार्य 2 मात्रा भार को 11 लिखने की छूट नहीं मापनी 2122 2122 212 भूमि धारे धीर, ऐसी धीरता। काट दे जो शीश, वो ही वीरता॥ रोप दें ये बीज, योद्धा रक्त के। बाग हों तैयार, ऐसे वक्त के॥ शक्त के हैं काज, छाती चीरता काट दे जो शीश, वो ही वीरता॥ ध्वस्त होते नित्य, वो षड्यंत्र हैं। सिद्ध वाणी सोच, सारे मंत्र हैं॥ यंत्र हैं वो नाद, देखो क्षीरता काट दे जो शीश, वो ही वीरता॥ आज बातें आम, होती देश से। शांत हो माहौल, क्या है क्लेश से॥ भेष से ही पस्त, ये गंभीरता काट दे जो शीश, वो ही वीरता॥ संजय कौशिक 'विज्ञात'

हर गम सहती है

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गीत हर गम सहती है । फिर भी हँसती है ।। चलना ही है जीवन, बस यही कहती है । हर हाल में वह मुस्काती रहती है ।। हर गम सहती है •••• फिर भी हँसती है ••••• तेरे एक आवाज पर, दौड़ी चली आती है । स्नेह की धारा लुटा, नदियाँ बन बहती जाती है ।। हर गम सहती है •••• फिर भी हँसती है ••••• भरे खेत में पानी, इधर बहते हैं अश्रु ।। घर में एक दाना नहीं, चूल्हा बन जलती है ।। हर गम सहती है •••• फिर भी हँसती है ••••• अपने लाल की खातिर, सब दुख उठाती है । हाथों की लकीर बढ़ाने, खुद ही मिटती है ।। हर गम सहती है •••• फिर भी हँसती है ••••• सपना पूरा हो उसका, खुशियाँ कदम चूमें उसके ।। थके कदम हैं फिर भी, बस चलती ही रहती है ।। हर गम सहती है •••• फिर भी हँसती है ••••• अनिता मंदिलवार सपना अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़

सहयोग

सहयोग हमें हमेशा एक दूसरे की सहयोग की जरूरत होती है बिना सहयोग अधूरे हैं हम लोगों से मिलकर परिवार, परिवार से समाज बनता है, समाज से शहर या गाँव, शहरों से मिलकर देश का निर्माण होता है हम अकेले कुछ भी नहीं हैं कुछ करने के लिए संगठन की आवश्यकता होती है संगठन शक्ति की एकता बहुत बड़े बड़े काम करवा देते हैं एक दूसरे का सहयोग करिए बिना किसी संकोच किसी ईष्या के यही आपकाअसली कर्म होना चाहिए । अनिता मंदिलवार सपना

संचय

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संचय संवादहीनता बढ़ रही है बिखर रहे मानवीय मूल्य करना होगा क्षमताओं का संचय अनमोल है मानव मूल्य मुझे मानव ही रहने दो जो मानवता के गुण से परिपूर्ण हो देह है क्षणभंगुर व्यापकता को अपनाओ याद रहेंगे सबके स्मरण में यही मानवीय गुण संचय करो अपने अंदर मानवीय मूल्यों को और बाँट दो इसे सबके बीच ! अनिता मंदिलवार सपना अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़