कुण्डलिया

आये शंकर साधु बन, नंदगाँव इस बार।
रूप भयंकर धार के, कहते अलख पुकार
कहते अलख पुकार, करूँ ललना के दर्शन।
मात किया इनकार, चले कर चुटकी स्पर्शन
कह कौशिक कविराय, तभी कान्हा चिल्लाये।
दुख पा तज हठ मात, किये दर्शन फिर आये

संजय कौशिक 'विज्ञात'

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