दिनाँक - 3/02/2020 दिन - सोमवार विषय - *पशुधन* विधा - दोहा छंद गौ की सेवा से हुआ, जीवन का उद्धार। दूध दही नवनीत है, भोजन के आधार।। गौ की रक्षा जो करे, होगा बेड़ा पार। वैतरणी ही वो तरेे, जो जीवन का सार।। गौ धन है सबसे बड़ा, धन से मत तू तोल। भवसागर से तार दे, दिल की आँखे खोल।। गोबर डालो खेत में ,है यह अच्छी खाद। स्वस्थ फसल तैयार हो, पक जाने के बाद।। गैया संगत खेलते, होते सदा विभोर। माखन नित ही खा रहे, देखो माखन चोर।। ✒ राधा तिवारी "राधेगोपाल" खटीमा ऊधम सिंह नगर उत्तराखंड
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संजय कौशिक 'विज्ञात' जी का बहुत पसंद किया जाने वाला गीत व्यंजना कितनी समेटूं पृष्ठों पर मनमीत मेरे देख अक्षर मौन हैं अब शांत हैं सब भाव मेरे मंद है बेशक कलम पर जानती है घाव मेरे इस हवा से जब छिपाये रक्त रंजित स्राव मेरे सागरों की उर्मियों में भी बसे अब गीत मेरे व्यंजना कितनी समेटूं पृष्ठों पर मनमीत मेरे हो सके तो छोड़ दे तू इस कलम से खेलना फिर मुक्त अभिव्यक्ति लिखेगी तो सहज हो झेलना फिर बन्द करना ये पड़ेगा तू करे अवहेलना फिर दाव पर मैं स्वप्न मेरे हारते तब जीत मेरे व्यंजना कितनी समेटूं पृष्ठों पर मनमीत मेरे बादलों ने पीर गाई घाटियाँ गुंजित हुई तब लेखनी की वेदना से वेदना कंपित हुई तब बिम्ब बनते कथ्य के बिन बात वो लंबित हुई तब आज तक अटकी हुई जो भाग्य की वो रीत मेरे व्यंजना कितनी समेटूं पृष्ठों पर मनमीत मेरे संजय कौशिक 'विज्ञात'
विशिष्ट सृजन, पूरा पढ़ें प्रतिक्रिया अपेक्षित है🙏 🌕🤴🌕🤴🌕🤴🌕🤴🌕🤴 ~~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा . (रोला छंद) . 🦅 *चंद्र, इन्द्र ....हम* 🦅 . 🌕...🤴....🌍 . ✨✨✨ चंद्र इंद्र नभ देव, सदा शुभ पूज्य हमारे। हम पर रहो प्रसन्न, रखो आशीष तुम्हारे। लेकिन मन के भाव, लेखनी सच्चे लिखती। देव दनुज नर सत्य, कमी बेशी जो दिखती। . ✨✨✨ क्षमा सहित द्वय देव, पुरानी बात सुनाऊँ। लिखता रोला छंद, भाव कुछ नये बताऊँ। शर्मा बाबू लाल, सुनी वह तुम्हे सुनाता। बीत गया युग काल, याद फिर से आजाता। . ✨✨✨ ...

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